ईरान संघर्ष में चीन द्वारा व्यापक युद्धविराम के लिए दबाव देने का अर्थ है कि बीजिंग इस बात का श्रेय लेने की कोशिश कर रहा है कि उसने ही इस गतिरोध को समाप्त किया है। रणनीतिक रूप से चीन का असल मकसद मानवीय आधार पर नहीं है, बल्कि एक गहरी रणनीतिक सोच है।

मई माह के दूसरे सप्ताह में, चीन बीजिंग में हुई एक मुलाक़ात के दौरान, विदेश मंत्री वांग यी ने अपने ईरानी समकक्ष अब्बास अराघची के सामने युद्ध समाप्त करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। इस्लामिक गणराज्य के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार के तौर पर, चीन का ईरान के फ़ैसले लेने की प्रक्रिया में काफ़ी प्रभाव है; और अमेरिका के साथ रुकी हुई शांति वार्ता ने बीजिंग के लिए एक प्रमुख कूटनीतिक शक्ति के रूप में अपनी मौजूदगी का लाभ उठाने का रास्ता खोल दिया है। अचानक से ईरान संघर्ष में चीन द्वारा व्यापक युद्धविराम के लिए दबाव देने का अर्थ है कि बीजिंग इस बात का श्रेय लेने की कोशिश कर रहा है कि उसने ही इस गतिरोध को समाप्त किया है।

रणनीतिक रूप से चीन का असल मकसद मानवीय आधार पर नहीं है, बल्कि एक गहरी रणनीतिक सोच है। चीन ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार है और मध्य पूर्व के ऊर्जा मार्गों पर बहुत अधिक निर्भर है। बीजिंग को इस बात का डर है कि हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य की रूकावट तेल की कीमतों में अचानक उछाल, आपूर्ति में रुकावटें, और आर्थिक अस्थिरता पैदा कर सकती है जो उसके लिए फायदेमंद नहीं है। यही कारण है कि चीन ने इस मीटिग में  बार-बार हॉर्मुज़ को फिर से खोलने और सुरक्षित समुद्री मार्ग सुनिश्चित करने की अपील की। हालांकि विशेषज्ञों की माने तो चीन के कथनी-करनी में बहुत अंतर देखा जाता रहा है।

भारत पहले से ही अमेरिका की गठबंधन-आधारित प्रणाली या चीन की लचीली लेकिन अपने हितों पर आधारित साझेदारियों के विपरीत, एक तीसरा रास्ता बनाने में  लगा हुआ है, जैसे- तनाव कम करने की अपील करना, तेहरान के साथ संबंध बनाए रखना, और वाशिंगटन तथा खाड़ी देशों की राजधानियों के साथ अपना जुड़ाव जारी रखना। भारत की यह स्थिति किसी तरह की दुविधा का द्योतक नहीं वरन एक सोची समझी रणनीति है। बीजिंग के लिए, भारत की ये तटस्थता एक सूक्ष्म, लेकिन महत्वपूर्ण फ़ायदा पहुँचाती है। हालांकि भविष्य की चेतावनियों पर गौर करने के बाद रणनीतिक दृष्टि से वह भी युद्ध विराम की बात करने लगा है। लेकिन नई दिल्ली, वॉशिंगटन के ईरान को लेकर अपनाए गए रुख़ के साथ पूरी तरह से तब तक तालमेल नहीं बिठा सकती, जब तक कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा, अपने कनेक्टिविटी से जुड़े हित (खास तौर पर ईरान से जुड़े रास्ते), और अपनी क्षेत्रीय कूटनीतिक विश्वसनीयता को ही ख़तरे में न डाल दे।

लचीलेपन के नियमों को अपनाते भारत-चीन

चीन की रणनीतिक प्राथमिकता लंबे समय से यही रही है कि वह बड़े गुटों से दूर रहे, और साथ ही अपने प्रतिद्वंद्वियों के बीच बिखराव को बढ़ावा दे। भारत का अमेरिका के साथ पूरी तरह से न जुड़ना, ठीक यही काम करता है। इससे इंडो-पैसिफ़िक क्षेत्र मे नाटो जैसी संरचना के उभरने की गुंजाइश कम हो जाती है और इससे यह भी सुनिश्चित हो जाता है कि अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन ढीले-ढाले, बातचीत के दायरे में और शर्तों पर आधारित ही रहेंगे। एक तरह से यह स्थिति चीन के लिए मुफीद है क्योंकि वॉशिंगटन किसी और ही तरफ उलझा होना, उसे समय और गुंजाइश देता है। इस तरह से, बिना सीधे तौर पर शामिल हुए भी, चीन को गठबंधनों के बिखराव से फ़ायदा होता है। भारत भी देखा जाए तो चीन की ही राह पर चल रहा है। वह भी अपनी लचीलेपन की नीति को ही अपनी ताक़त के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। भारत की तटस्थता इस बात को और मज़बूत करती है, क्योंकि वह ईरान के खिलाफ़ अमेरिका के नेतृत्व वाले गुट में शामिल होने से बचता है। ऐसे में वह चीन-विरोधी किसी मज़बूत गठबंधन के बनने को सीमित करता है चूंकि भारत मध्य-पूर्व से आने वाली ऊर्जा पर बहुत ज्यादा निर्भर है, खासकर होर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे संवेदनशील रास्तों से। ऐसे में उसके लिए किसी भी तरह का तनाव सीधे तौर पर महंगाई, औद्योगिक उत्पादन, और आर्थिक स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है। संकट गहराने पर भारत को किसी भी तरह की रुकावट का तुरंत सामना करना पड़ता है। जबकिअइतर इसके, चीन अपनी सप्लाई चेन को ज्यादा तेज़ी से अलग-अलग जगहों पर फैला रहा है। इसी वजह से भारत के लिए तटस्थत रवैया सिर्फ़ एक कूटनीतिक विकल्प ही नहीं, बल्कि एक आर्थिक ज़रूरत बन जाती है। दरअसल ईरान संघर्ष समकालीन भू-राजनीति की एक निर्णायक वास्तविकता को रेखांकित करता है- शक्ति अब केवल किसी एक पक्ष को चुनने में नहीं है, बल्कि उन पक्षों के बीच के खाली स्थान को आकार देने में है।

युद्ध से दूर रणनीतिक लाभ उठाता चीन

सीधे युद्ध से दूर रहकर चीन को कोई नुकसान नहीं उठाना पड़ा, जबकि दूसरे देश (अमेरिका, ईरान, इज़राइल) सैन्य और आर्थिक बोझ उठा रहे हैं। जानकारों का कहना है कि बीजिंग ने सीधे शामिल हुए बिना ही स्थिति का पूरा लाभ उठाया है, जिससे कम लागत में उसकी वैश्विक स्थिति बेहतर हुई है। इसे बड़ी ताकतों की एक क्लासिक रणनीति कहे तो  गलत न होगा। युद्ध के मैदान में उतरे बिना अस्थिरता से पूरा फ़ायदा उठाना। इस वक्त इस संघर्ष ने अमेरिका का ध्यान, भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से एशिया से हटा दिया है। सैन्य संसाधन और कूटनीति कारणों से इस लंबे खींचते संघर्ष से वैश्विक स्तर पर अमेरिका का प्रभाव कमज़ोर होने की संभावना अधिक ही है और इससे अमेरिका के गठबंधनों और विश्वसनीयता को भी नुकसान पहुँच सकत है, जाहिरा तौर पर इसका फायदा परोक्ष रूप से चीन को ही होगा।

कूटनीतिक स्थिति के तहत, चीन खुद को एक निष्पक्ष मध्यस्थ के तौर पर पेश करता है जो युद्धविराम की अपील करता है और अमेरिका की सैन्य कार्रवाई के बिल्कुल विपरीत है। इससे ग्लोबल साउथ में एक ज़िम्मेदार वैकल्पिक शक्ति के तौर पर उसकी छवि मज़बूत होती है। यूं भी चीन के ईरान के साथ पहले से ही गहरे ऊर्जा और आर्थिक संबंध हैं, जिनमें तेल व्यापार और बुनियादी ढांचे में निवेश शामिल है। संघर्ष के दौरान भी संबंध बनाए रखकर, चीन जब भी संभव हो, रियायती दरों पर ऊर्जा हासिल करता है। इस तरह से वह मध्य पूर्व में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। खुफिया जानकारी और रणनीतिक सीख का लाभ भी चीन इस संघर्ष से ले रहा है। यह युद्ध चीन को अमेरिकी सैन्य रणनीतियों और क्षमताओं को ’रियल टाइम’  में देखने का अवसर प्रदान करता है, जो एक मूल्यवान रणनीतिक लाभ है।

हालांकि चीन साफ़ तौर पर इन परिस्थितियो का विजेता भी नहीं कहा जा सकता। ऊर्जा को लेकर उसकी कमज़ोरी साफ नजर आती है। वह भी मध्य-पूर्व के तेल पर बहुत ज्यादा निर्भर करता है। उसके समक्ष रुकावटें कम नहीं है- (जैसे, होर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव) सप्लाई चेन के लिए खतरा पैदा करती हैं, कीमतें तेज़ी से बढ़ती हैं और इससे इंडस्ट्री को नुकसान होता है। इन रुकावटों की वजह से चीन को भी अमेरिका से ऊर्जा आयात पर अपनी निर्भरता बढ़ानी पड़ी है। इसलिए इसे एक रणनीतिक विरोधाभास कहा जाना उचित है बजाय परिस्थिति का लाभ उठाना।

इस संघर्ष से हो रहे आर्थिक जोखिम की अनदेखी नहीं की सकती। इस निरन्तर चलते संघर्ष से वैश्विक विकास और मांग के धीमा होने की उम्मीद है, जिससे चीन की निर्यात-आधारित अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा। बढ़ती ऊर्जा लागत पहले से ही चीन के मैन्युफैक्चरिंग मार्जिन को कम कर रही है।  फिर एक लंबा या बड़ा युद्ध बेल्ट एंड रोड मार्गों को नुकसान पहुंचा सकता है। मुख्य साझेदारों को अस्थिर कर सकता है। चीन के ईरान और खाड़ी देशों, दोनों के साथ संबंध हैं। यह संघर्ष बीजिंग को एक नाज़ुक स्थिति में डाल देता है, जिससे दोनों ही पक्षों के साथ उसके संबंधों पर खतरा मंडराता है

‘संतुलनकारी शक्ति’ के रूप में भूमिका निभाता भारत 

2026 के ईरान संघर्ष में भारत की भूमिका को एक लड़ाकू पक्ष के रूप में नहीं, बल्कि एक ’संतुलनकारी शक्ति’ के रूप में समझना सबसे उचित होगा और इस संतुलन का संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बीच की प्रतिद्वंद्विता पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। भारत ने किसी का पक्ष लेने से परहेज़ किया है; उसने संयम बरतने और युद्धविराम की अपील की है, साथ ही सभी पक्षों (अमेरिका, ईरान, इज़राइल, खाड़ी देशों) के साथ अपने संबंध बनाए रखे हैं। बहु-आयामी कूटनीति अपना कर भारत खाड़ी के राजतंत्रों, ईरान और इज़राइल, सभी से एक साथ बातचीत कर रहा। यह भारत के लंबे समय से चले आ रहे ’रणनीतिक स्वायत्तता’  के सिद्धांत को दर्शाता है। अमेरिका-चीन संबंधों के बीच भारत एक ’स्विंग स्टेट’ के तौर पर नजर आता है। ईरान विवाद की वजह से अमेरिका की रणनीतिक क्षमता पर ज़रूरत से ज््यादा दबाव पड़ा है, जिससे उसके सैन्य और कूटनीतिक संसाधन इंडो-पैसिफिक क्षेत्र से हटकर दूसरी तरफ़ चले गए हैं। जाहिर है इससे एक दुविधा की स्थिति पैदा होती है। चीन के मुक़ाबले में, संतुलन बनाए रखने के लिए, अमेरिका को भारत की ज़रूरत ज्यादा है। लेकिन भारत, अमेरिका की नीतियों के साथ पूरी तरह से तालमेल बिठाने को लेकर कम इच्छुक हो जाता है। चीन के खिलाफ़ अमेरिका की ’कंटेनमेंट स्ट्रैटेजी’ (रोकथाम की रणनीति) में भारत एक ऐसा साझीदार बनकर उभरता है जिसके रवैये का अंदाज़ा लगाना मुश्किल होता है।

देखा जाए तो भारत का स्वतंत्र रुख़ अमेरिका के गठबंधन बनाने के प्रयासों को कमज़ोर करता है, जिससे परोक्ष रूप से चीन को फ़ायदा होता है। भारत ’गुट-राजनीति’ का विरोध करता है। दिल्ली का यह रवैया यह संकेत देता है कि वह अमेरिका का औपचारिक सहयोगी नहीं बनेगा। वह स्थायी गठबंधन के बजाय, मुद्दों पर आधारित तालमेल को प्राथमिकता देकर भारत एशिया में नाटो जैसी कोई संरचना बनाने की अमेरिका की रणनीति को कमज़ोर करता है। ऊर्जा भू-राजनीति में भारत दोनों शक्तियों से अलग है। चीन की तुलना में भारत मध्य-पूर्व में होने वाली उथल-पुथल से अधिक प्रभावित होता है। होरमुज़ जलडमरूमध्य के बंद होने से भारत में जो स्थितियाँ पैदा हुईं उनमें ऊर्जा संकट, आपातकालीन तेल उपाय (जैसे, वैकल्पिक आयात के लिए यूएस द्वारा दी गई छूट) चीन के विपरीत (जो तेज़ी से अपने स्रोतों में विविधता ला रहा), भारत को तत्काल आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ता है।

रणनीतिक स्वायत्तता बनाम गठबंधन प्रणालियों का टकराव एक प्रमुख ढांचागत विभाजन को और मज़बूत करता है। अमेरिका का मॉडल गठबंधन-आधारित (नाटो एंड शैली, गुट-राजनीति), जबकि भारत का मॉडल बहु-संरेखण (सभी पक्षों से बातचीत) और चीन का मॉडल लचीली साझेदारियाँ के साथ-साथ अहस्तक्षेप का दावा करता है। भारत के दृष्टिकोण से देखें तो चीन के साथ प्रतिस्पर्धा करते हुए भी, वह चीन के ’गुटनिरपेक्ष व्यावहारिकता’ जैसा ही बर्ताव कर रहा है। ईरान संघर्ष ने अपने साझेदारों के बीच अमेरिका की विश्वसनीयता को कमज़ोर किया है, जिससे एक साथ कई मोर्चों को संभालने की उसकी क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं। इससे भारत जैसे देशों को आत्मनिर्भरता में निवेश करना (रक्षा, नौसेना, ऊर्जा), अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता से बचने की ओर ध्यान देना होगा। चीन के लिए, गठबंधनों का यह बिखराव फायदेमंद साबित होता है क्योंकि इससे भारत और अमेरिका के बीच नीतियों में मतभेद पैदा होता है। 

ईरान संघर्ष में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण वास्तविकता को उजागर करती है। यह न तो अमेरिका के साथ जुड़ा है और न ही चीन के साथ। लेकिन इसके चुनाव ही इन दोनों के बीच के संतुलन को आकार देते हैं। इसकी तटस्थता कठोर गुट-राजनीति को कमज़ोर करती है। इसकी स्वायत्तता अमेरिका के वर्चस्व को सीमित करती है।

निष्कर्ष

कुल मिलाकर कहे तो इस युद्ध से पैदा हुए संकट से अगर भारत उभरता है, वह एक निष्क्रिय नहीं, बल्कि एक निर्णायक भारत कहा जायेगा। इसलिए सभी पक्षों से जुड़ते हुए, लेकिन किसी के भी प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध न होते हुए, नई दिल्ली, खुद को इस तरह स्थापित करें जो प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच एक सेतु के रूप में, ग्लोबल साउथ (वैश्विक दक्षिण) की एक आवाज़ के रूप में, और बदलती वैश्विक व्यवस्था में एक स्वतंत्र ध्रुव के रूप में नजर आए।

Image Credit: CGTN

Author

Mrs. Rekha Pankaj is a senior Hindi Journalist with over 38 years of experience. Over the course of her career, she has been the Editor-in-Chief of Newstimes and been an Editor at newspapers like Vishwa Varta, Business Link, Shree Times, Lokmat and Infinite News. Early in her career, she worked at Swatantra Bharat of the Pioneer Group and The Times of India's Sandhya Samachar. During 1992-1996, she covered seven sessions of the Lok Sabha as a Principle Correspondent. She maintains a blog, Kaalkhand, on which she publishes her independent takes on domestic and foreign politics from an Indian lens.

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