अमेरिका, चीन और रूस के बीच लगातार बदलती त्रिकोणीय गतिशीलता ने भारत को एक अनोखी और जटिल भू-राजनीतिक स्थिति में ला खड़ा किया है। हालांकि भारत अपनी लंबे समय से चली आ रही रणनीतिक स्वायत्तता की नीति को बनाए रखने का प्रयास कर रहा है, और साथ ही ’क्वाड’, ’ब्रिक्स’ और ’शंघाई सहयोग संगठन’ जैसी लचीली साझेदारियों के माध्यम से प्रतिस्पर्धी शक्ति केंद्रों के साथ भी जुड़े रहकर तटस्थ व्यवहार बनाए हुआ है।

अमेरिका, चीन और रूस के बीच लगातार बदलती त्रिकोणीय गतिशीलता ने भारत को एक अनोखी और जटिल भू-राजनीतिक स्थिति में ला खड़ा किया है। भारत अपनी लंबे समय से चली आ रही रणनीतिक स्वायत्तता की नीति को बनाए रखने का प्रयास कर रहा है, और साथ ही ’क्वाड’, ’ब्रिक्स,’ और ’शंघाई सहयोग संगठन’  जैसी लचीली साझेदारियों के माध्यम से प्रतिस्पर्धी शक्ति केंद्रों के साथ भी जुड़े रहकर तटस्थ व्यवहार बनाए हुआ है। विश्लेषकों का तर्क है कि भारत की विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य केवल ’तटस्थता’ बनाए रखना नहीं है, बल्कि महाशक्तियों के बीच चल रही प्रतिद्वंद्विता के बावजूद, अपने निर्णय लेने की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखना है। पश्चिम के साथ अपने बढ़ते जुड़ाव के साथ-साथ, भारत ने मॉस्को के साथ भी अपने करीबी संबंध बनाए रखे हैं। यही वजह रही कि पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद, रूसी तेल का बड़े पैमाने पर आयात जारी रहा, जिससे नई दिल्ली को काफी आर्थिक लाभ मिला है। हालाँकि पश्चिमी पर्यवेक्षक अक्सर भारत की निर्भरता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं, फिर भी अभी रूस भारत की ऊर्जा सुरक्षा का एक प्रमुख स्तंभ बना हुआ है।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और भारत के बीच बढ़ते तनाव के कारण भारत की भू-राजनीतिक दिशा बदल सकती है, जिससे भारत चीन के और करीब आ सकता है। वहीं, कुछ अन्य विशेषज्ञों का तर्क है कि चीन और भारत के संबंधों में आई नरमी, असल में भारत के उस व्यापक प्रयास का ही एक हिस्सा है जिसके तहत वह एक ’बहु-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था’ की दिशा में आगे बढ़ते हुए अपनी ’रणनीतिक स्वायत्तता’ को बनाए रखना चाहता है। ये सभी सिद्धांत अगस्त 2025 में उस समय अपने चरम पर पहुँच गए, जब प्रधानमंत्री मोदी सात वर्षों में पहली बार चीन की यात्रा पर गए और तियानजिन में आयोजित  शिखर सम्मेलन के दौरान उन्होंने शी जिनपिंग से मुलाक़ात की। दोनों नेताओं ने अपने संबंधों को स्थिर बनाने के प्रयास में, एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी के बजाय ’साझेदार’ कहकर संबोधित किया और आपसी संबंधों को बेहतर बनाने के लिए सामान्य स्तर के संकल्प व्यक्त किए।

जब से 2025 में ट्रंप व्हाइट हाउस लौटे हैं, तब से यह चिंता बनी हुई है कि भारतीय एक्सपोर्ट पर लगाए गए टैरिफ, अमेरिका और भारत द्वारा अपने संबंधों को मज़बूत करने के लिए दो दशकों से भी ज्यादा समय से किए जा रहे प्रयासों को खत्म कर सकते हैं। जुलाई 2025 में, ट्रंप प्रशासन ने भारत पर कुल 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की; 25 प्रतिशत ’पारस्परिक टैरिफ’ के तौर पर-जिसे ट्रंप ने एक अनुचित व्यापार असंतुलन माना-और यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत द्वारा रूसी तेल का लगातार इंपोर्ट जारी रखने के कारण, अतिरिक्त 25 प्रतिशत तथाकथित प्रतिबंध टैरिफ का दबाव बनाया। भारत, पाकिस्तान और दक्षिण एशिया मामलों की एडजंक्ट सीनियर फेलो, एलिसा एयर्स के अनुसार, ’भारतीय मीडिया और रणनीतिक विश्लेषक इस बात से बहुत नाराज़ हैं। लोग सोच रहे हैं कि अमेरिका, जो दशकों से भारत के साथ मिलकर एक मज़बूत रणनीतिक साझेदारी बना रहा है, वह अचानक अपने इस करीबी रणनीतिक साझेदार के साथ अपने कुछ सबसे कड़े प्रतिस्पर्धियों से भी ज्यादा बुरा बर्ताव क्यों कर रहा है।’

शिखर सम्मेलन कूटनीति के माध्यम से अमेरिका और चीन के बीच अस्थायी सुलह की संभावना, वैश्विक सत्ता की राजनीति, रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और विकसित हो रही भू-राजनीतिक गतिशीलता में बदलती प्राथमिकताओं का संकेत देती है। एक तरफ तो यूक्रेन संघर्ष के बाद चीन पर रूस की बढ़ती निर्भरता एक मजबूत होती यूरेशियाई साझेदारी को दर्शाती है; जिसका भारत की रणनीतिक गणनाओं, विदेश नीति के विकल्पों और क्षेत्रीय सुरक्षा संरचना में विकसित हो रहे गठबंधन ढांचों पर प्रभाव पड़ने की संभावना है। दूसरी ओर समकालीन अंतरराष्ट्रीय संबंध तेजी से सत्ता के कई प्रतिस्पर्धी केंद्रों द्वारा आकार ले रहे हैं, जिसके लिए मध्यम शक्तियों से, बेहतर बहुपक्षीय सहयोग और रणनीतिक साझेदारियों के माध्यम से, लचीली और अनुकूलनीय विदेश नीति प्रतिक्रियाओं की आवश्यकता है।

रणनीतिक प्रतिद्वंद्विताएँ अब केवल सैन्य क्षेत्रों तक ही सीमित न रहकर प्रौद्योगिकी, व्यापार, आपूर्ति श्रृंखलाओं और महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे तक फैल गई हैं; ये आर्थिक दबाव और शक्ति-प्रदर्शन की रणनीतियों के माध्यम से वैश्विक गठबंधनों को नया रूप दे रही हैं, जिससे भू-राजनीतिक वास्तविकताएँ भी पुनर्परिभाषित हो रही हैं। इसके अलावा, पारंपरिक गठबंधन अब अधिक लेन-देन-आधारित होते जा रहे हैं, जिससे भारत जैसे देशों को बदलते सुरक्षा परिवेश में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और व्यावहारिक जुड़ाव तथा रणनीतिक तालमेल के बीच संतुलन बनाने के लिए विवश होना पड़ रहा है।

चीन-रूस साझेदारी के गहराने का प्रभाव

शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन के बीच मज़बूत होती साझेदारी ने भारत के रणनीतिक दायरे को जटिल बना दिया है। हाल ही में हुए चीन-रूस शिखर सम्मेलनों में ’व्यापक रणनीतिक साझेदारी,’ अमेरिका की मिसाइल रक्षा प्रणालियों की संयुक्त आलोचना, और पश्चिमी नेतृत्व वाली सुरक्षा संरचनाओं के विरोध पर ज़ोर दिया गया। ऐसी परिस्थितियों से, भारत के लिए, इस घटनाक्रम से जोखिम और अवसर, दोनों ही पैदा होते हैं । चीन पर रूस की बढ़ती निर्भरता ने यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी प्रतिबंधों ने बीजिंग पर मॉस्को की आर्थिक निर्भरता बढ़ा दी है। भारत को चिंता है कि कमज़ोर रूस रणनीतिक रूप से चीन के अधीन हो सकता है, जिससे एक स्वतंत्र संतुलनकारी शक्ति के रूप में मॉस्को की उपयोगिता कम हो जाएगी। भारत की रक्षा नीति पर इससे दबाव बनता है। भारत अभी भी रूसी मूल के सैन्य उपकरणों पर बहुत ज्यादा निर्भर है। रूस और चीन के बीच बढ़ता सैन्य समन्वय संवेदनशील रक्षा प्रौद्योगिकियों और क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों में कमज़ोरियाँ पैदा कर सकता है। रणनीतिक घेराबंदी की चिंताएँ भी भारत के लिए कम नहीं है जबकि दक्षिण एशिया और हिंद महासागर में चीन का बढ़ता प्रभाव, पाकिस्तान के साथ उसके करीबी संबंध और बीजिंग के साथ रूस की समानांतर भागीदारी, उसके लिए रणनीतिक दायरे के सिकुड़ने की आशंकाएँ पैदा करते हैं।

हालांकि इस गठबंधन से भारत के पास अवसरों की भी कमी नहीं दिखती। बहु-सहभागिता के ज़रिए कूटनीतिक बढ़त के रूप में वॉशिंगटन, मॉस्को और बीजिंग के साथ भारत की एक साथ सहभागिता उसे एक स्वतंत्र ’स्विंग पावर’ के रूप में खुद को स्थापित करने का अवसर देती है। दूसरे, भारत खुद को ग्लोबल साउथ की एक ऐसी आवाज़ के रूप में पेश कर सकता है, जो न तो पूरी तरह से पश्चिमी देशों के साथ जुड़ी है और न ही चीन के नेतृत्व वाले किसी गुट का हिस्सा है। इसके अलावा, अमेरिका और चीन के बीच तनाव ने वैश्विक सप्लाई-चेन के विविधीकरण को बढ़ावा दिया है, जिससे भारत को मैन्युफैक्चरिंग, सेमीकंडक्टर और टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप के क्षेत्रों में नए अवसर मिले हैं।

भारत के ‘स्ट्रेटेजिक कैलकुलेशन’ कई असलियतों से तय होते हैं

चीन भारत के लिए लंबे समय की मुख्य सिक्योरिटी चुनौती बना हुआ है, क्योंकि बॉर्डर के साथ विवाद सुलझे नहीं हैं, इंडो-पैसिफिक में मिलिट्री मुकाबला है, और बीजिंग का क्षेत्रीय असर बढ़ रहा है। चीन को बैलेंस करने में अमेरिका भारत का सबसे ज़रूरी स्ट्रेटेजिक और टेक्नोलॉजिकल पार्टनर है। भारत की डिफेंस सप्लाई, एनर्जी सिक्योरिटी और यूरेशियन कनेक्टिविटी के लिए रूस बहुत ज़रूरी है। इससे वह बनता है जिसे कई जानकार “बैलेंसिंग ट्रायंगल” कहते हैं, जहाँ भारत एक पोल के साथ पूरी तरह से अलाइन नहीं हो सकता, बिना दूसरे के साथ नुकसान उठाए। चीन-अमेरिका-भारत के बीच उभरते त्रिकोणीय रिश्ते में कुछ अहम विशेषताएं हैं, जैसे कि समावेशिता, बहु-केंद्रित स्वरूप, आपसी जुड़ाव और नए वैश्वीकरण से प्रेरित होना। खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में, इन तीनों देशों के पास एक-दूसरे से स्वतंत्र रहते हुए भी पूरक लाभ मौजूद हैं। संक्षेप में कहें तो, चीन-अमेरिका-भारत का यह ’कमज़ोर त्रिकोण’ शीत युद्ध के दौरान देखने को मिले अत्यधिक टकराव वाले पैटर्न से बिल्कुल अलग है। यह एक समावेशी और बहु-केंद्रित मॉडल पर ज़ोर देता है, और उम्मीद की जाती है कि आपसी निर्भरता तथा रणनीतिक लचीलेपन के ज़रिए यह पारंपरिक सत्ता-संघर्ष के जाल से बचते हुए, मिलकर भविष्य की अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को आकार देगा।

सबसे ज्यादा संभावना यही है कि भारत पश्चिम के साथ सहयोग जारी रखेगा और अमेरिका के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी बनाए रखेगा, साथ ही रूस और चीन के साथ अपने करीबी रिश्ते भी कायम रखेगा। रूस-भारत-चीन का यह ’ट्रिपल एंटेंट’ (त्रिपक्षीय गठबंधन) किसी भी तरह से पश्चिम-विरोधी या अमेरिका-विरोधी गुट के तौर पर नहीं है, बल्कि यह भारत की अपनी भू-राजनीतिक ज़रूरतों के आकलन को दर्शाता है। हालाँकि, यह स्थिति बदल सकती है-अगर अमेरिका-भारत संबंधों में मौजूदा गिरावट का सिलसिला जारी रहता है, और अगर राष्ट्रपति ट्रंप की भारत के प्रति आलोचना सिर्फ़ व्यापार तक ही सीमित न रहकर राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों तक भी पहुँच जाती है। अगर अमेरिका भारत और पाकिस्तान को एक ही नीतिगत दायरे में रखने की कोशिश करता है, कश्मीर विवाद में दखल देता है, या कराची को फिर से सैन्य सहायता देना शुरू कर देता है, तो नई दिल्ली संभवतः इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देगा।

रूस-भारत-चीन की ऐसी साझेदारी, जिसमें भारत इन दोनों साझेदारों पर पूरी तरह भरोसा करे, सबसे कम संभावित परिदृश्य है। भारत एक बहुध्रुवीय व्यवस्था चाहता है, जबकि रूस एक द्विध्रुवीय दुनिया में वापसी चाहता है। वहीं, चीन एक निर्विवाद वैश्विक महाशक्ति बनना चाहता है। भारत और चीन दोनों ही खुद को सभ्यतागत राष्ट्र और प्रमुख एशियाई शक्तियाँ मानते हैं, जिनके प्रभाव क्षेत्र आपस में टकराते हैं। इस मतभेद को दूर करने के लिए एक या दो शिखर सम्मेलनों से कहीं ज़्यादा प्रयासों की ज़रूरत होगी।

भारत को अपनी आंतरिक शक्ति बढ़ाने की ज़रूरत

विश्व राजनीति में एक अहम ’स्विंग स्टेट’ के तौर पर भारत की मौजूदा हैसियत, हिंद-प्रशांत क्षेत्र की भू-राजनीतिक सोच से जुड़ी हुई है; यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसकी पहचान काफी हद तक अमेरिका और चीन के बीच की प्रतिद्वंद्विता से होती है। फिर भी, हिंद-प्रशांत के विचार की अहमियत इस बात में भी है कि इस क्षेत्र के प्रमुख देश-खास तौर पर अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत-इसे साझा मूल्यों वाले एक क्षेत्र के तौर पर देखते हैं, ’स्वतंत्र और खुला’। इस क्षेत्र के भीतर और बाहर, चीन को मौजूदा व्यवस्था के लिए एक चुनौती के तौर पर देखे जाने से, प्रशांत और हिंद महासागर के पूरे इलाके में एक उदारवादी व्यवस्था को बचाने और मज़बूत करने की कोशिशों को नई गति मिली है। इसलिए, ’स्वतंत्रता और खुलापन’ चीन के बढ़ते क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव का मुकाबला करने की एक रणनीति है, और ये ऐसे मूल्य हैं जिन पर हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा और समृद्धि निर्भर करती है।

भारत की लंबे समय की रणनीतिक ताकत मुख्य रूप से आर्थिक विकास, औद्योगीकरण और बुनियादी ढांचे के विकास को तेज़ करने पर निर्भर करती है। तकनीकी प्रगति के नजरिए से अपनी क्षमताओं में मौजूद कमियों को दूर करने के लिए अनुसंधान, नवाचार, उच्च शिक्षा और स्वदेशी विनिर्माण में ज्यादा निवेश करना ज़रूरी है। सैन्य तत्परता के निहितार्थ, भारत को तालमेल, आधुनिकीकरण और सीमा पर बुनियादी ढांचे के विकास के ज़रिए अपनी रक्षा तैयारियों को लगातार बेहतर बनाते रहना चाहिए। मानव संसाधन विकास जैसे एआई और सेमीकंडक्टर जैसे उभरते क्षेत्रों में अपनी प्रतिस्पर्धी क्षमता बनाए रखने के लिए कुशल मानव संसाधन तैयार करना बेहद ज़रूरी है। इसके अलावा रणनीतिक रूप से मज़बूत बने रहने के लिए भारत को ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और विनिर्माण जैसे अहम क्षेत्रों में बाहरी ताकतों पर अत्यधिक निर्भरता कम करना ज़रूरी है।

निष्कर्ष

भारत की समकालीन विदेश नीति किसी साधारण गठबंधन के बजाय एक परिष्कृत संतुलन रणनीति को दर्शाती है। जैसे-जैसे अमेरिका और चीन के बीच परिवर्तनशील संबंधों और चीन-रूस संबंध दृष्टिगोचर हो रहे हैं, भारत इन कठोर गुटों की व्याख्या में फँसने से बचना चाहता है, और साथ ही प्रतिस्पर्धी ध्रुवों के बीच अपनी साझेदारियों को भी अधिकतम करना चाहता है। संक्षेप में कहें तो भारत की रणनीति पारंपरिक गुटनिरपेक्षता से विकसित होकर ’चुनिंदा साझेदारियों के साथ बहु-संरेखण’ (multi & alignment with selective partnerships) की ओर बढ़ रही है -जो कि एक तेज़ी से खंडित होते बहुध्रुवीय विश्व-व्यवस्था में आगे बढ़ने का एक व्यावहारिक प्रयास है।

Image Credit: ISPI

Author

Mrs. Rekha Pankaj is a senior Hindi Journalist with over 38 years of experience. Over the course of her career, she has been the Editor-in-Chief of Newstimes and been an Editor at newspapers like Vishwa Varta, Business Link, Shree Times, Lokmat and Infinite News. Early in her career, she worked at Swatantra Bharat of the Pioneer Group and The Times of India's Sandhya Samachar. During 1992-1996, she covered seven sessions of the Lok Sabha as a Principle Correspondent. She maintains a blog, Kaalkhand, on which she publishes her independent takes on domestic and foreign politics from an Indian lens.

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