विदेशी इन्फ्लुएंसर्स के साथ चीन का बढ़ता जुड़ाव, अंतरराष्ट्रीय संचार के प्रति सीपीसी के नज़रिए में आए बड़े बदलाव को दिखाता है। सिर्फ़ पारंपरिक सरकारी मीडिया और आधिकारिक संदेशों पर निर्भर रहने के बजाय, बीजिंग एक ऐसा नेटवर्क वाला और सरकार द्वारा समर्थित मॉडल विकसित कर रहा है जो चीनी नैरेटिव की पहुँच बढ़ाने के लिए डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म, प्रांतीय संस्थानों और तीसरे पक्ष की आवाज़ों को एक साथ लाता है। इसके तहत सरकारी संस्थान, क्रिएटर्स को चीन के शहरों, टेक्नोलॉजी, सांस्कृतिक जगहों और राजनीतिक रूप से संवेदनशील इलाकों तक पहुँच देकर, पॉलिसी और विकास की बातों को सीधे अनुभव में बदल सकते हैं। इन अनुभवों में क्रिएटर-आधारित कंटेंट वाली सुलभता और आज़ादी का एहसास होता है। भारत, शिनजियांग और ताइवान जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील इलाकों में यह तरीका और भी अहम हो जाता है, क्योंकि यहाँ तीसरे पक्ष की आवाज़ें बीजिंग के नैरेटिव को उन लोगों तक भी पहुँचा सकती हैं, जिन तक चीन के आधिकारिक संचार की पहुँच आम तौर पर नहीं होती।

This piece was originally written in English. Read it here. It has been translated to Hindi by Rekha Pankaj. 

हाल ही में जब भारत में चीन के राजदूत शू फीहोंग ने विदेशी पर्यटकों का एक वीडियो शेयर किया, जिसमें वे चीन में अपने अनुभवों के बारे में बात कर रहे थे, तो उनके साथ लिखे संदेश 'देखना ही यकीन करना है' (Seeing is believing) ने चीन की राष्ट्रीय छवि बनाने के नज़रिए में आए एक अहम बदलाव को दिखाया। इस वीडियो में चीन के बारे में बेहतर सोच को सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसिंग से जोड़ा गया; पर्यटकों ने बताया कि कैसे पारंपरिक मीडिया के साथ-साथ इन्फ्लुएंसर का कंटेंट और ऑनलाइन शेयर किए गए निजी अनुभव देश के बारे में लोगों की राय बनाते हैं। जानकारी के बदलते इस माहौल में, विदेशी इन्फ्लुएंसर के ज़रिए खबरों तक पहुँच और उनकी आसान उपलब्धता, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ चाइना (सीपीसी) के अंतरराष्ट्रीय संचार के लिए एक ताकतवर ज़रिया बन गई है।

मीडिया के इस्तेमाल के बदलते तरीकों ने इन्फ्लुएंसर्स की पहुंच बढ़ा दी है; युवा पीढ़ी सोशल मीडिया के साथ बड़ी हुई है और उमदराज लोग भी अब डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर ज्यादा एक्टिव हो रहे हैं। मीडिया के इस नए रूप ने जानकारी बनाने और उसे देखने-पढ़ने के तरीके को बदल दिया है। अब विदेशी क्रिएटर्स, टेक्नोलॉजी रिव्यूअर्स और लाइफ़स्टाइल क्रिएटर्स भी आधिकारिक चैनलों के साथ-साथ दृश्यता और विश्वसनीयता के अतिरिक्त स्रोतों के तौर पर काम कर रहे हैं। सीपीसी और उसकी विभिन्न एजेंसियां अपने पारंपरिक प्रोपेगैंडा सिस्टम को हटाने के बजाय, मीडिया के इस बदलते माहौल के हिसाब से खुद को ढाल रही हैं। वे सरकारी नैरेटिव की पहुंच बढ़ाने के लिए सोशल मीडिया और थर्ड-पार्टी की आवाज़ों का इस्तेमाल कर रही हैं।

चीनी प्रचार-प्रसार के तरीकों में बदलाव

यह बदलाव सीपीसी की उस बड़ी कोशिश का हिस्सा है जिसका मकसद चीन की अंतरराष्ट्रीय कम्युनिकेशन क्षमता को मज़बूत करना है। मई 2021 में अंतरराष्ट्रीय कम्युनिकेशन पर पोलितब्यूरो के सामूहिक अध्ययन सत्र के दौरान, राष्ट्रपति शी ने भी चीन की 'सच्ची, बहुआयामी और व्यापक' तस्वीर पेश करके 'चीन की कहानी को अच्छे से बताने' का आह्वान किया। इस कोशिश का मुख्य मकसद चीन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी बात रखने की ताकत, या 'हुआयू क्वान' को उसकी व्यापक राष्ट्रीय ताकत और अंतरराष्ट्रीय हैसियत के बराबर लाना था। इस रणनीति में अलग-अलग क्षेत्रों और विभागों से यह भी कहा गया कि वे अपनी-अपनी खूबियों का इस्तेमाल करें और अलग-अलग देशों व दर्शकों के लिए ज्यादा नए और खास मकसद वाले कम्युनिकेशन तरीके विकसित करें। अंतरराष्ट्रीय कम्युनिकेशन को पार्टी कमेटियों और पार्टी स्कूलों की वैचारिक ज़िम्मेदारियों में भी शामिल किया गया, जिससे बाहरी नैरेटिव बनाने के काम को पार्टी के शासन तंत्र से और ज्यादा मज़बूती से जोड़ा जा सके।

राष्ट्रपति शी के 2021 के बयानों पर आधिकारिक टिप्पणी में मज़बूत अंतरराष्ट्रीय संचार को विवादित वैश्विक सूचना माहौल के जवाब के तौर पर पेश किया गया। इसमें ’चीन से खतरा’ और 'चीन के पतन' जैसी थ्योरी और कोविड-19 के राजनीतिकरण जैसे नैरेटिव की ओर इशारा किया गया। नतीजतन, सीपीसी ने अंतरराष्ट्रीय संचार को अपने राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे में शामिल करना शुरू कर दिया और नैरेटिव बनाने को शासन-कला का एक ज़रूरी हिस्सा माना, जो पार्टी-राज्य तंत्र के अलग-अलग हिस्सों तक फैला हुआ है। यह संस्थागतकरण चीन के साइबरस्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (सीपीसी) जैसी एजेंसियों की गतिविधियों में दिखता है, जिसने विदेशी इन्फ्लुएंसर से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय संचार पहलों का समर्थन किया है, जबकि यूनाइटेड फ्रंट वर्क डिपार्टमेंट (UFWD) ने नए-मीडिया से जुड़े लोगों और ऑनलाइन राय बनाने वाले नेताओं को जोड़ने के लिए 'ऑनलाइन यूनाइटेड-फ्रंट वर्क' का विस्तार किया है। हाल के चीनी शोध में भी राष्ट्रीय संचार क्षमता को शासन के आधुनिकीकरण का हिस्सा माना गया है।

जैसे-जैसे चीन अपनी 15वीं पंचवर्षीय योजना के दौर में प्रवेश कर रहा है, विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल बदलाव का दायरा केवल औद्योगिक आधुनिकीकरण तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे नैरेटिव (विमर्श) के प्रबंधन तक भी बढ़ाया जाना चाहिए; इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल प्लेटफॉर्म सांस्कृतिक 'सॉफ्ट पावर' और अंतरराष्ट्रीय संचार क्षमता को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

संचार के बदलते इस ढांचे में, विदेशी क्रिएटर्स चीन की आधिकारिक बातों और अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के बीच एक उपयोगी कड़ी के तौर पर उभर रहे हैं। विदेशी इन्फ्लुएंसर्स के वीडियो, जिनमें शंघाई की भविष्यवादी स्काईलाइन, चोंगकिंग का शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर या सिचुआन के खान-पान की परंपराएं दिखाई जाती हैं, वे शायद ही कभी पारंपरिक राजनीतिक संदेशों जैसे लगते हैं। इसके बजाय, वे अपने खास ढंग से पेश किए गए वीडियो के ज़रिए चीन को तकनीकी रूप से उन्नत और स्थिर देश के तौर पर दिखाते हैं। हाई-स्पीड रेल यात्रा को रिकॉर्ड करने वाला ट्रैवल व्लॉगर या टेक्नोलॉजी पर ध्यान देने वाला और चीनी इलेक्ट्रिक गाड़ियों का रिव्यू करने वाला इन्फ्लुएंसर, सरकारी प्रचार के बजाय स्वतंत्र राय देता हुआ लगता है। हालांकि, रणनीतिक संचार के नज़रिए से, व्यक्तिगत कहानी कहने और देश की छवि बनाने के बीच का फ़र्क धुंधला हो गया है। यह संचार इकोसिस्टम, कुशल शासन और राष्ट्रीय पुनरुत्थान की बात को मज़बूत करके चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के शासन के तरीके को भी बढ़ावा देता है। विदेशी क्रिएटर्स द्वारा सकारात्मक चित्रण, जिसे चीनी सरकारी मीडिया द्वारा दोबारा शेयर किया जाता है, पार्टी के विकास मॉडल के लिए बाहरी समर्थन का काम करता है और इसके शासन में घरेलू भरोसे को मज़बूत करने की कोशिश करता है।

क्रिएटर इकॉनमी के ज़रिए डिजिटल सॉफ्ट पावर

इस तरह, पार्टी ऐसे नेटवर्क के ज़रिए शासन करती है जिनमें सरकारी संस्थाएं, प्राइवेट सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म और साथ ही प्रांतीय व मार्केट से जुड़े लोग शामिल होते हैं। झेजियांग और जिलिन जैसी प्रांतीय सरकारों ने विदेशी पत्रकारों, कंटेंट क्रिएटर्स और सोशल मीडिया हस्तियों के साथ सहयोग को आसान बनाने के लिए 'इंटरनेशनल कम्युनिकेशन सेंटर' बनाए हैं। वे मीडिया टूर, सांस्कृतिक उत्सव और टेक्नोलॉजी प्रदर्शनियों का आयोजन करते हैं और साथ ही कंटेंट बनाने के लिए ज़रूरी लॉजिस्टिकल सहायता भी देते हैं। उनकी भूमिका सिर्फ़ पर्यटन को बढ़ावा देने तक ही सीमित नहीं है; वे विदेशी क्रिएटर्स के लिए चीन को खुद अनुभव करने के मौके भी बनाते हैं और पार्टी के व्यापक कम्युनिकेशन लक्ष्यों को मज़बूत करते हैं।

रोज़मर्रा की ज़िंदगी, संस्कृति और विकास पर ज़ोर देना, चीन की कूटनीति में आए उस बड़े बदलाव से भी मेल खाता है जिसमें चीन के साथ जुड़ाव को साफ़ तौर पर राजनीतिक संदेश देने के बजाय आपसी आदान-प्रदान के ज़रिए दिखाया जाता है। 'ग्लोबल सिविलाइज़ेशन इनिशिएटिवश' (GCI) साफ़ तौर पर लोगों के बीच मज़बूत अंतरराष्ट्रीय आदान-प्रदान की बात करता है, जबकि 'कम्युनिटी विद अ शेयर्ड फ़्यूचर फ़ॉर मैनकाइंड' (मानवता का साझा भविष्य) एक ऐसा ढांचा देता है जिसके ज़रिए बीजिंग आदान-प्रदान, विकास और आपसी सीख को वैचारिक टकराव के विकल्प के तौर पर पेश करता है। 'क्रिएटर-लेड डिप्लोमेसी' (कंटेंट बनाने वालों के ज़रिए कूटनीति) के माध्यम से, सभ्यतागत आदान-प्रदान जैसे अमूर्त विचारों को भोजन, तकनीक, शहरों और रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़ी आसान कहानियों के ज़रिए पेश किया जाता है। यह तरीका 'शिओंगश्आन न्यू एरिया', स्मार्ट-सिटी पहल और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग पार्क जैसे अहम प्रोजेक्ट्स के प्रचार में भी दिखता है, जहाँ विदेशी पत्रकारों और डिजिटल क्रिएटर्स के दौरे चीन की विकास प्राथमिकताओं को सीधे अनुभव में बदलते हैं, जिन्हें रिकॉर्ड करके अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के साथ साझा किया जा सकता है।

विवादित राजनीतिक क्षेत्रों में इन्फ्लुएंसर

इस तरह के कम्युनिकेशन की राजनीतिक अहमियत तब और बढ़ जाती है जब ये नैरेटिव ऐसे देशों के लोगों तक पहुँचते हैं जहाँ चीन के बारे में राय भू-राजनीतिक तनाव और क्षेत्रीय संप्रभुता के विवादित दावों से बनती है। भारत इसका एक बहुत अच्छा उदाहरण है कि कैसे चीन के साथ पहले से तनावपूर्ण राजनीतिक रिश्तों के बीच क्रिएटर्स द्वारा बनाए गए नैरेटिव काम करते हैं। 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़पों के बाद, चीन के प्रति भारत का नज़रिया तेज़ी से बिगड़ा जिसके बाद से भारत सरकार ने कई चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगा दिया और चीनी निवेश की कड़ी जाँच-पड़ताल शुरू कर दी। हालाँकि, इस राजनीतिक तनाव के बीच सामाजिक स्तर पर जुड़ाव का एक अलग रूप भी देखने को मिला, जिसमें भारतीय ट्रैवल क्रिएटर्स ने देश के दर्शकों के लिए चीनी संस्कृति और टेक्नोलॉजी को दिखाया। 2026 में, युन्नान मीडिया ग्रुप ने मणिपुरी एक्ट्रेस सोमा लैशराम को ज़िशुआंगबाना में 'वॉटर फेस्टिवल' में शामिल होने के लिए बुलाया। इससे पता चलता है कि कैसे प्रांत के मीडिया संस्थानों ने भारतीय मशहूर हस्तियों के साथ जुड़ने में मदद की है और अपनी डिजिटल मौजूदगी के ज़रिए इन मुलाकातों को ज्यादा से ज्यादा भारतीय दर्शकों तक पहुँचाया है। चीनी दूतावास की डिजिटल गतिविधियाँ यह भी दिखाती हैं कि कैसे स्वतंत्र रूप से बनाया गया कंटेंट आधिकारिक कम्युनिकेशन चैनलों तक पहुँच सकता है; दूतावास के प्रवक्ता यू जिंग भारतीय क्रिएटर्स को बढ़ावा देते हैं, जिनके चीन के निजी अनुभव का इस्तेमाल देश के बारे में बनी नकारात्मक सोच को बदलने के लिए किया जाता है।

शिनजियांग से यह साफ़ पता चलता है कि सरकारी संस्थाएँ किस तरह बाहरी लोगों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए जान-बूझकर विदेशी क्रिएटर्स को शामिल कर सकती हैं। 2025 में, स्टेट काउंसिल इन्फॉर्मेशन ऑफिस (CMG) ने एक श्वेत पत्र (White Paper) जारी किया। इसमें शिनजियांग की सफलताओं को गरीबी दूर करने और आतंकवाद-विरोधी प्रयासों के एक आदर्श मॉडल के तौर पर दिखाया गया, साथ ही मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोपों को खारिज किया गया।

इन आधिकारिक बयानों के साथ-साथ, शिनजियांग उइगुर स्वायत्त क्षेत्र की पीपल्स गवर्नमेंट के इन्फॉर्मेशन ऑफिस और चाइना मीडिया ग्रुप (CMG) ने मिलकर ’शिनजियांग वाइब्स’ (Xinjiang Vibes) कैंपेन चलाया। इस कैंपेन के तहत 14 देशों के इन्फ्लुएंसर्स को शिनजियांग की यात्रा करने और वहाँ का सोशल मीडिया कंटेंट बनाने के लिए आमंत्रित किया गया, ताकि इस क्षेत्र में 'जातीय एकता’'और 'ग्रामीण विकास' को दिखाया जा सके। सबसे अहम बात यह है कि आयोजकों ने बताया कि इससे तैयार होने वाला मटीरियल इन्फ्लुएंसर्स के अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स और चाइना मीडिया ग्रुप के इंटरनेशनल नेटवर्क, दोनों के ज़रिए बांटा जाएगा। यह हाइब्रिड मॉडल विदेशी इन्फ्लुएंसर्स की इंटरनेशनल पहुँच को सरकारी संस्थाओं की पहुँच, संगठनात्मक क्षमताओं और प्रचार-प्रसार की ताक़त के साथ जोड़ता है।

डिजिटल स्टोरीटेलिंग का लॉजिक सिर्फ़ इमेज बनाने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह संप्रभुता और राष्ट्रीय पहचान के सवालों से भी जुड़ा है। फरवरी 2026 में, यूनाइटेड फ्रंट वर्क डिपार्टमेंट (न्थ्ॅक्) की वेबसाइट पर छपे एक लेख में 'ऑनलाइन यूनाइटेड-फ्रंट वर्क' को यूनाइटेड-फ्रंट रणनीति का एक अहम हिस्सा बताया गया। इसमें नए मीडिया से जुड़े लोगों और ऑनलाइन ओपिनियन लीडर्स को ऐसे महत्वपूर्ण समूहों के तौर पर पहचाना गया जो जनमत को प्रभावित करते हैं। साथ ही, इसमें यह भी कहा गया कि ऑनलाइन यूनाइटेड-फ्रंट वर्क को यूनाइटेड-फ्रंट की अलग-अलग गतिविधियों में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल करके राजनीतिक पहुंच बढ़ाई जा सके और आम सहमति बनाई जा सके। नतीजतन, जून 2026 में चीन के ताइवान मामलों के कार्यालय ने खुले तौर पर 'ताइवानी लोगों, जिनमें इंटरनेट इन्फ्लुएंसर भी शामिल हैं,' को मुख्य भूमि (मेनलैंड) का दौरा करने के लिए प्रोत्साहित किया। उनसे कहा गया कि वे 'वहाँ के बारे में अलग-अलग तरीकों से जानें, दूसरों को इसके बारे में बताएं और अपने वास्तविक अनुभव तथा विकास के अवसरों को साझा करें।' इसके अलावा, सरकारी मीडिया ने 'चाइना डेली’'की ताइवान से जुड़े मुद्दों पर बनी सीरीज़ के तहत ताइवानी इन्फ्लुएंसर को चीन के बारे में जानकारी देते हुए दिखाया। इस सीरीज़ का मकसद साफ़ तौर पर डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (DPP) प्रशासन द्वारा फैलाई जा रही गलत सूचनाओं का मुकाबला करना है। इन प्रत्यक्ष अनुभवों का रणनीतिक महत्व इस बात में भी है कि इनके ज़रिए मुख्य भूमि के विकास की कहानियाँ जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) के पार के दर्शकों तक पहुँच सकती हैं और फैल सकती हैं।

गवर्नेंस के नज़रिए से देखें तो, विदेशी क्रिएटर्स के साथ चीन का जुड़ाव यह दिखाता है कि डिजिटल दौर में पार्टी किस तरह कम्युनिकेशन को मैनेज करती है। सीधे तौर पर रेगुलेशन और सेंसरशिप अब भी अहम हैं, लेकिन अब इनके साथ-साथ एक नेटवर्क वाला तरीका भी अपनाया जा रहा है। इसमें सरकारी संस्थाएं चुनिंदा आवाज़ों को बढ़ावा दे सकती हैं और ऐसे प्लैटफ़ॉर्म और दर्शकों तक अपनी बात पहुंचा सकती हैं, जहां पारंपरिक सरकारी मीडिया की पहुंच नहीं होती। नैरेटिव को मैनेज करने का यह अप्रत्यक्ष तरीका, डिजिटल स्पेस पर सीएसी के सीधे रेगुलेशन और सेंसरशिप के साथ-साथ चलता है। इससे सीपीसी न सिर्फ़ यह तय कर पाती है कि किस चीज़ पर रोक लगानी है, बल्कि यह भी तय कर पाती है कि चीन की कौन सी छवि ज्यादा लोगों तक पहुंचे और फैले। इस मॉडल में विदेशी क्रिएटर्स काफ़ी अहम हैं क्योंकि उनका कंटेंट ऐसे ऑडियंस नेटवर्क तक पहुंच सकता है, जहां सरकारी कम्युनिकेशन का सीधे पहुंचना मुश्किल हो सकता है। कुल मिलाकर, ये बदलाव 'चीन की कहानी को अच्छे से बताने' के तरीके में एक बड़े विकास को दिखाते हैं। यह एक ऐसे सरकारी कम्युनिकेशन मॉडल की ओर इशारा करता है जो डिजिटल प्लैटफ़ॉर्म और तीसरी पार्टी की आवाज़ों का इस्तेमाल करके सीमाओं के पार चीन का प्रभाव बढ़ाता है।

Author

Chitra Nair is a postgraduate in Chinese Studies from SOAS University of London, holding a bachelor’s degree in International Relations with a minor in Environmental Studies from FLAME University, India. Her research explores contemporary Chinese politics, digital activism, political expression and censorship. She is especially interested in how the state and citizens negotiate power and legitimacy, questions which she seeks to explore through a political sociology lens. She previously interned at the Institute of Chinese Studies, New Delhi, where she published work on media censorship and the queer community in China. Her dissertation, Digital Panopticon : Activism and State Surveillance in China, examines digital activism and censorship in China through three key case studies.

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