हुआंगयान दाओ (स्कारबोरो शोल) नेशनल नेचर रिज़र्व बनाने और उस पर कड़ी नज़र रखने का चीन का फ़ैसला कई बातों पर आधारित है - जैसे पर्यावरण, रणनीति, क़ानून, अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति। हालाँकि बीजिंग आधिकारिक तौर पर इस रिज़र्व को पर्यावरण संरक्षण की पहल बताता है, लेकिन कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का तर्क है कि इससे दक्षिण चीन सागर के सबसे विवादित इलाकों में से एक पर चीन का प्रशासनिक नियंत्रण मज़बूत होता जा रहा है।

अगस्त माह के शुरूवात में चीन ने विवादित दक्षिण चीन सागर में ‘हुआंगयान दाओ नेशनल नेचर रिज़र्व’ के लिए मैनेजमेंट के उपाय जारी किए, जिसके तहत नियमों का उल्लंघन करने वालों को संबंधित कानूनों और नियमों के तहत जवाबदेह ठहराया जाएगा। इसमें साफ तौर पर यह कहा गया है कि बिना पहले से मंज़ूरी लिए, मछली पकड़ने, माइनिंग करने और कोरल, कोरल रीफ़ या विशाल क्लैम (giant clams) निकालने जैसी कोई भी गतिविधि करना मना है, क्योंकि इनसे दुर्लभ समुद्री प्रजातियों और प्राकृतिक इकोसिस्टम को नुकसान पहुँचता है। इस कदम के बाद फिलीपींस के साथ समुद्री विवाद और बढ़ने की संभावना है, क्योंकि फिलीपींस भी अब तक इस शोल (उथले समुद्री इलाके) पर अपना दावा करता आया है।

बीजिंग का खाली जगहों (मिंजनतमे) को निशाना बनाना, जो सिर्फ़ 'सैंडी के' तक सीमित नहीं है, उसके पिछले बड़े द्वीप-निर्माण अभियान के बाद से आए एक अहम बदलाव को दिखाता है। 2013 के आखिर और 2015 के बीच, पहले से कब्ज़े वाली सात जगहों को बड़ा करने के लिए चीन ने, रेत और कोरल की खुदाई की और बाद में उन पर मिलिट्री और आम लोगों के इस्तेमाल की सुविधाएँ बनाईं। सच तो ये है कि बिना आबादी वाली जगहों तक अपनी गतिविधियाँ बढ़ाकर, बीजिंग 'एसोसिएशन ऑफ़ साउथईस्ट एशियन नेशन्स' (ASEAN) के सदस्यों के साथ 2002 में किए गए उस गैर-बाध्यकारी वादे को कमज़ोर कर रहा है, जिसमें उसने इन जगहों पर आबादी न बसाने की बात कही थी। इस बीच, बीजिंग समुद्र में अपने पड़ोसियों के संप्रभु अधिकारों के इस्तेमाल को चुनौती देना जारी रखे हुए है; वह मछली पकड़ने और समुद्र में ऊर्जा से जुड़ी गतिविधियों में दखल देता है और उनके 'एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन' (EE) में बिना इजाज़त समुद्री सर्वे करता है। हुआंगयान दाओ (स्कारबोरो शोल) नेशनल नेचर रिज़र्व बनाने और उस पर कड़ी नज़र रखने का चीन का फ़ैसला कई बातों पर आधारित है - जैसे पर्यावरण, रणनीति, क़ानून, अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति। हालाँकि बीजिंग आधिकारिक तौर पर इस रिज़र्व को पर्यावरण संरक्षण की पहल बताता है, लेकिन कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का तर्क है कि इससे दक्षिण चीन सागर के सबसे विवादित इलाकों में से एक पर चीन का प्रशासनिक नियंत्रण भी मज़बूत होता जा रहा है। कुछ आलोचकों का तर्क ये भी है कि चीन की ये गतिविधियाँ डीओसी ( DOC)  के उस वादे के खिलाफ हैं जिसमें ऐसे कामों से बचने की बात कही गई है जिनसे विवाद और जटिल या गंभीर हो सकते हैं।

संप्रभुता के दावों के पीछे रणनीतिक सैन्य महत्व एक बड़ी वजह

ऐतिहासिक रूप से तो चीन, साउथ चाइना सी के सभी इलाकों को अपने नियंत्रण में मानता है, भले ही दक्षिण-पूर्वी एशियाई कई देशों के भी दावे हो। इन सभी दावों को खारिज करने के लिए 1992 में चीन ने एक कानून पास किया, जिसमें साउथ चाइना सी पर अपने दावे जताए और साथ ही इन दावों को लागू करने के लिए बल प्रयोग का अधिकार भी अपने पास रखा। विवादित द्वीप असल में साउथ चाइना सी में चट्टानी उभारों से ज्यादा कुछ नहीं हैं, और ज़मीन के लिहाज़ से उनकी कीमत भी बहुत कम है। 1982 के 'यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ़ द सी' (UNCLOS) ने भी इसकी पुष्टि की लेकिन एक सच ये भी है कि इन द्वीपों पर मालिकाना हक के दावों के पीछे समुद्र की तलहटी में मौजूद हाइड्रोकार्बन और खनिज हैं, साथ ही इन द्वीपों की रणनीतिक भौगोलिक स्थिति भी एक वजह है, क्योंकि ये द्वीप महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों और व्यापारिक मार्गों पर स्थित हैं।

हुआंगयान दाओ जैसी जगहों पर नियंत्रण होने से, संसाधनों की खोज से जुड़े समुद्री इलाकों पर अपना दावा पेश करते समय किसी देश की स्थिति मज़बूत हो सकती है। इसलिए, विश्लेषक इस शोल को केवल इसके तात्कालिक पारिस्थितिक महत्व से कहीं ज्यादा, रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं। जानकारों ने भी साफ़ तौर पर कहा है कि यह रिज़र्व चीन की समुद्री सीमा की आधार-रेखाओं और समुद्री अधिकारों की रक्षा करने में मदद करता है। स्कारबोरो शोल पर अक्सर चीनी और फिलीपीन जहाजों के बीच टकराव होता रहता है, क्योंकि दोनों ही इस इलाके पर अपना दावा जताते हैं। यह दक्षिण चीन सागर के उन कई द्वीपों, छोटे द्वीपों और रीफ़ में से एक है, जिन पर चीन और उसके एक या उससे ज्यादा पड़ोसी देश जैसे वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान भी अपना का दावा रखते है।

हालांकि यह रिज़र्व कोई सैन्य ठिकाना नहीं है, फिर भी हुआंगयान दाओ एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जगह पर स्थित है। फिलीपींस के लुज़ोन द्वीप से लगभग 220 किलोमीटर पश्चिम में, प्रशांत महासागर और दक्षिण चीन सागर को जोड़ने वाले प्रमुख शिपिंग मार्गों के अलावा व्यावसायिक और नौसैनिक जहाजों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले मार्गों के करीब स्थित होने से चीन को यहां नियमित कोस्ट गार्ड और समुद्री कानून-प्रवर्तन गश्त बनाए रखने में मदद मिलती है। इस तरह से वह दावा करने वाले अन्य देशों की गतिविधियों पर तेज़ी से प्रतिक्रिया देने में सक्षम होता है। हाल ही में इस शोल (उथले पानी वाले इलाके) के पास हुए चीनी सैन्य अभ्यास भी इसके लगातार बने हुए रणनीतिक महत्व को दर्शाते हैं।

‘मिसचीफ रीफ’ की घटना के बाद, 1995 को मनीला में फिलीपींस और चीन के प्रतिनिधि की भेंट के बाद एक संयुक्त बयान जारी किया गया, जिसमें 'दोनों पक्षों के बीच भरोसा और विश्वास बढ़ाने' के लिए एक आचार संहिता (code of conduct) की जानकारी दी गई। फिलीपींस को उम्मीद थी कि इससे इस इलाके में चीन की तरफ से कोई और एकतरफा कार्रवाई नहीं होगी, लेकिन 1997 में ‘स्प्रैटलीज़’ में फिलीपींस के कब्ज़े वाले द्वीपों के पास चीनी युद्धपोत देखे जाने और पास की रीफ पर और ढाँचे मिलने से ये उम्मीदें टूट गईं। जनवरी 1999 में चीन ने और ढाँचे बनाए; इस बार ये कंक्रीट से बने थे और इनमें एक हेलीकॉप्टर लैंडिंग-पैड जैसा ढाँचा भी शामिल था। चीन के इस कब्जे के बावजूद फ़िलीपींस, साउथ चाइना सी में अपने 'एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन' में आने वाले 'मिस्चीफ़ रीफ' पर अपना दावा करता आया है और चीन की ओर से उस 'शोल' (उथले पानी वाले इलाके) पर एक रिज़र्व बनाने की योजना के ऐलान को 'कब्ज़ा करने का साफ़ बहाना' कहता है।

चीन समुद्री शासन और कानूनी स्थिति को दरकिनार करता है?

चीन अपने दावों को मज़बूत करने के लिए लगातार प्रशासनिक उपाय अपना रहा है, जैसे कि समुद्री सीमा की आधार-रेखा (बेसलाइन) तय करना, संरक्षित क्षेत्र बनाना और कोस्ट गार्ड की गश्त बढ़ाना। बीजिंग के नज़रिए से, ये कदम उस इलाके पर उसके प्रभावी शासन को दिखाते हैं। हालाँकि, फिलीपींस इन उपायों को नहीं मानता है। वह 2016 के 'परमानेंट कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन' के उस फ़ैसले का हवाला देता है, जिसमें कहा गया था कि यूएनसीएलओएस के तहत चीन के 'नाइन-डैश लाइन' वाले दावों का कोई कानूनी आधार नहीं है। चीन ने उस फ़ैसले को मानने से इनकार कर दिया था और वह आज भी उसे मान्यता नहीं देता। कानूनी मतभेद का यह मुद्दा दक्षिण चीन सागर में तनाव की एक मुख्य वजह बना हुआ है।

चीन के बाहर कई सुरक्षा और समुद्री कानून विशेषज्ञ मानते हैं कि इस रिज़र्व के कई मकसद हैं-यह चीन के असल प्रशासनिक नियंत्रण को मज़बूत करने के साथ-साथ कोस्ट गार्ड की कार्रवाई बढ़ाने के लिए कानूनी और पर्यावरणीय आधार देता है। यह विवादित समुद्री इलाके पर चीन के शासन को सामान्य बनाने में मदद करता है। यही नहीं बड़े पैमाने पर यह ज़मीन बनाने (¼ land reclamation) का सहारा लिए बिना चीन की लंबी अवधि की समुद्री रणनीति को आगे बढ़ाता है। कुछ विश्लेषक पर्यावरणीय आधार पर इस पर भी सवाल उठाते हैं। उनका कहना है कि रीफ़ के कुछ हिस्सों को पहले की गतिविधियों, जैसे कि 'जायंट क्लैम' (एक तरह की बड़ी सीप) को इकट्ठा करने, से नुकसान पहुँचा था। उनका तर्क कि संरक्षण के उपाय भू-राजनीतिक लक्ष्यों से जुड़े हुए हैं, जो अपनी जगह सही ही है।

कई पश्चिमी सुरक्षा विश्लेषक मानते हैं कि चीन ने अक्सर 2002 के डीओसी ( DOC ) की भावना और कुछ मामलों में स्पष्ट वादों के खिलाफ काम किया है। अंतरराष्ट्रीय कानूनी विशेषज्ञों और आसियान के दावेदार देशों का कहना है कि चीन का द्वीप बनाना, सैन्यीकरण, समुद्री इलाकों में ज़बरदस्ती की गतिविधियां और एकतरफा प्रशासनिक कदम, डीओसी के उस वादे के खिलाफ हैं जिसमें संयम बरतने और विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने की बात कही गई है। जबकि चीन का तर्क है कि वह डीओसी के प्रति प्रतिबद्ध है, इस घोषणापत्र को आसियान के साथ मिलकर लागू किया जा रहा है, और उसकी गतिविधियां संप्रभुता का वैध इस्तेमाल और बचाव के मकसद से की जा रही हैं।

2002 में सभी आसियान देशों और चीन ने डीओसी पर साइन किए थे ताकि तनाव कम करने के लिए दावा करने वाले देश संयम बरतें। इसमें दावा करने वाले देशों को आपस में भरोसा और विश्वास बनाने और समुद्री सहयोग वाली गतिविधियां करने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया। हालांकि, डीओसी कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है और नियमों का पालन न करने पर दावा करने वाले देशों पर दबाव डालने में असरदार नहीं है। 2002 में डीओसी पर साइन करने के बाद देशों ने कुछ हद तक संयम बरता, लेकिन मछली पकड़ने की गतिविधियों, संसाधनों की खोज के अधिकारों और कुछ अन्य गैर-सैन्य विवादों को लेकर कुछ झड़पें हुई हैं।

निष्कर्ष

चीन का हुआंगयान दाओ नेशनल नेचर रिज़र्व पर खास ध्यान देने के पीछे पर्यावरण, रणनीति, अर्थव्यवस्था और राजनीति से जुड़े आपसी मकसद स्पष्ट तौर पर सागर पर अपनी संप्रभुता का जाहिर करते है। जहां तक डीओसी की बात है चीन भले ही कहे कि उसके काम कानूनी हैं, बचाव के लिए हैं और आपसी समझौते के अनुरूप हैं। तो यह बात भी अपनी जगह सही है डीओसी बाध्यकारी संधि के बजाय एक राजनीतिक घोषणा है, इसलिए इसके पालन को सुनिश्चित करने के लिए कोई औपचारिक लागू करने की व्यवस्था नहीं है। आने वाले समय में साउथ चाइना सी के विवादों को एक ज्यादा व्यापक और असरदार आचार संहिता के आधार पर बेहतर ढंग से संभाले जाने का प्रयत्न लाभकारी हो सकता है। नई आचार संहिता के ड्राफ्ट में ऐसे प्रतिबंध शामिल किए जाने चाहिए जो देशों को ऐसी गतिविधियां करने से रोकें जिनसे दूसरे दावेदारों के हितों को नुकसान पहुंचे। देशों पर नियमों का पालन करने की ज़िम्मेदारी होगी और विवादों के समाधान होने तक उन्हें संयुक्त सहयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।

Image Credit: China Daily

Author

Mrs. Rekha Pankaj is a senior Hindi Journalist with over 38 years of experience. Over the course of her career, she has been the Editor-in-Chief of Newstimes and been an Editor at newspapers like Vishwa Varta, Business Link, Shree Times, Lokmat and Infinite News. Early in her career, she worked at Swatantra Bharat of the Pioneer Group and The Times of India's Sandhya Samachar. During 1992-1996, she covered seven sessions of the Lok Sabha as a Principle Correspondent. She maintains a blog, Kaalkhand, on which she publishes her independent takes on domestic and foreign politics from an Indian lens.

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