पीसीए अर्थात परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन फैसले के एक दशक पूरे होने के संदर्भ में 'ग्लोबल टाइम्स' के एक विश्लेषण में साउथ चाइना सी में नियमों पर आधारित समुद्री व्यवस्था और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के समर्थन में भारत के बयानों का विश्लेषण किया गया है और जिसमें विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के बयानों का हवाला देकर कहा गया है कि भारत 'समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन' (UNCLOS) के अनुसार नेविगेशन (आवाजाही) की स्वतंत्रता, ओवरफ्लाइट और बिना किसी रुकावट के व्यापार पर जोर देता है। लेख के अनुसार, नई दिल्ली अपने क्षेत्रीय हितों को संतुलित करते हुए चीन-भारत संबंधों में हालिया सुधार में किसी भी तरह की बाधा से बचने की कोशिश कर रही है। लेख इस बात की ओर भी इशारा करता है कि भारत नहीं चाहता कि साउथ चाइना सी मध्यस्थता का मुद्दा द्विपक्षीय संबंधों के सुधार पर असर डाले, साथ ही वह फिलीपींस जैसे क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ रक्षा और रणनीतिक सहयोग को भी मजबूत करना चाहता है। इस लेख में भारत में चीन के राजदूत जू फीहोंग द्वारा 2016 के मध्यस्थता फैसले को खारिज करने का भी जिक्र किया गया है, जिसमें बीजिंग ने साउथ चाइना सी पर अपनी संप्रभुता के दावों को दोहराया और फैसले को 'गैर-कानूनी, शून्य और अमान्य' करार दिया।
परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन और चीनी रवैया
चीन ने दिसंबर 2014 में एक 'पोजीशन पेपर' और दूसरे आधिकारिक बयानों के ज़रिए यह साफ़ कर दिया था कि उसकी नज़र में इस मामले में परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल के पास अधिकार-क्षेत्र नहीं है। चीनी सरकार ने इन मध्यस्थता की कार्यवाही को न तो कभी स्वीकार करने और न ही उनमें भाग लेने के अपने रुख को बनाए रखा, बल्कि उसने 7 दिसंबर 2014 के 'दक्षिण चीन सागर मध्यस्थता मामले में अधिकार-क्षेत्र पर पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की सरकार का स्थिति-पत्र', नीदरलैंड्स में चीनी राजदूत द्वारा ट्रिब्यूनल के सदस्यों को लिखे गए पत्रों और कई सार्वजनिक बयानों में अपने इस रुख को दोहरा दिया। चीनी सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन बयानों और दस्तावेजों का 'किसी भी तरह से यह अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए कि चीन मध्यस्थता की कार्यवाही में किसी भी रूप में भाग ले रहा है।'
ट्रिब्यूनल 'साउथ चाइना सी' में चीन के कामों की वैधता पर विचार करता रहा है। उसके अनुसार चीन को फिलीपींस के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन में उसके संप्रभु अधिकारों का उल्लंघन करते पाया गया है। ऐसा उसने फिलीपींस की मछली पकड़ने और पेट्रोलियम की खोज की गतिविधियों में दखल देकर, कृत्रिम द्वीप बनाकर और चीनी मछुआरों को उस ज़ोन में मछली पकड़ने से न रोककर किया। ट्रिब्यूनल का यह भी मानना है कि फिलीपींस के मछुआरों को, चीन के मछुआरों की तरह ही, स्कारबोरो शोल पर पारंपरिक रूप से मछली पकड़ने का अधिकार था और चीन ने वहाँ जाने पर रोक लगाकर इन अधिकारों में दखल दिया। ट्रिब्यूनल ने आगे यह भी माना कि चीन के कानून लागू करने वाले जहाजों ने फिलीपींस के जहाजों का रास्ता रोककर गैर-कानूनी तरीके से टक्कर का गंभीर खतरा पैदा किया। उसके अनुसार, चीन ने कोरल रीफ़ पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुँचाया है और नाज़ुक इकोसिस्टम तथा खत्म हो रही, खतरे में पड़ी या लुप्तप्राय प्रजातियों के आवास को बचाने और उनकी सुरक्षा करने की अपनी ज़िम्मेदारी का उल्लंघन किया है। यहां तक कि आर्बिट्रेशन (मध्यस्थता) शुरू होने के बाद से चीन की हरकतों ने दोनों पक्षों के बीच विवाद को और बढ़ाया ही है।
'सेकंड थॉमस शोल' पर फिलीपींस के मरीन और चीन के नौसेना व कानून लागू करने वाले जहाजों के बीच आमने-सामने की स्थिति के नतीजों पर विचार करने का अधिकार क्षेत्र नहीं था, क्योंकि इस विवाद में सैन्य गतिविधियां शामिल थीं और इसलिए इसे अनिवार्य समाधान प्रक्रिया से बाहर रखा गया था। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने पाया कि चीन द्वारा हाल ही में बड़े पैमाने पर ज़मीन को फिर से हासिल करने (लैंड रिक्लेमेशन) और कृत्रिम द्वीप बनाने का काम, विवाद सुलझाने की प्रक्रिया के दौरान किसी देश की ज़िम्मेदारियों के अनुकूल नहीं था; क्योंकि चीन ने समुद्री पर्यावरण को अपूरणीय नुकसान पहुंचाया है, फिलीपींस के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन में एक बड़ा कृत्रिम द्वीप बनाया है, और दक्षिण चीन सागर में उन भौगोलिक संरचनाओं की प्राकृतिक स्थिति के सबूत नष्ट कर दिए हैं जो दोनों पक्षों के विवाद का हिस्सा थीं। दक्षिण चीन सागर के जलक्षेत्र में संसाधनों पर चीन के जो भी ऐतिहासिक अधिकार थे, वे अधिकार उस हद तक खत्म हो गए जहाँ वे कन्वेंशन में दिए गए विशेष आर्थिक क्षेत्रों (म्मर््) के साथ मेल नहीं खाते थे। ट्रिब्यूनल के अनुसार 'नाइन-डैश लाइन' के दायरे में आने वाले समुद्री क्षेत्रों में संसाधनों पर ऐतिहासिक अधिकारों का दावा करने के लिए चीन के पास कोई कानूनी आधार नहीं था।
पीसीए पर चीनी रवैये पर विश्लेषकों की राय
कई जानकारों का मानना है कि बीजिंग क्षेत्रीय संप्रभुता और समुद्री सीमाओं से जुड़े मामलों को ऐसा मानता है जिनका फ़ैसला किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से नहीं किया जा सकता। इस संबंध में चीनी जानकारों का तर्क है कि क्षेत्रीय संप्रभुता, संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन से पहले की बात है। ज़ू के युआन और जिया बिंग बिंग जैसे चीन के जाने-माने कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रिब्यूनल ने संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के दायरे की गलत व्याख्या की और आर्टिकल 298 के तहत चीन की कानूनी घोषणा को नज़रअंदाज़ किया। सेंटर फ़ॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ के जानकारों का मानना है कि चीन के इनकार के पीछे मुख्य रूप से रणनीतिक वजहें थीं जैसे- भविष्य के क्षेत्रीय विवादों पर असर डालने वाली कानूनी नज़ीर (मिसाल) बनने से रोकना, समुद्री बातचीत में लचीलापन बनाए रखना। सैन्य अभियानों पर पाबंदियों से बचना, संप्रभुता के मामले में समझौता न करने वाला रुख दिखाकर घरेलू राजनीतिक वैधता बनाए रखना। इन जानकारों का यह भी तर्क है कि फ़ैसले को मानने से चीन की व्यापक समुद्री रणनीति कमज़ोर हो सकती थी। कई कानूनी जानकारों का मानना है कि चीन के इनकार से संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के तहत विवाद सुलझाने की प्रक्रिया की विश्वसनीयता कम होती है।
अंतरराष्ट्रीय कानूनी विशेषज्ञ रॉबर्ट बेकमैन और स्टीफन टैलमोन जैसे विशेषज्ञों का कहना है कि, संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के तहत यह फैसला संबंधित पक्षों के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी है। फैसलों का पालन करने से अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था मजबूत होती है। लगातार पालन न करने से अनिवार्य विवाद समाधान प्रक्रिया में भरोसा कम होने का खतरा रहता है। हालांकि, वे यह भी मानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कानून में इसे प्रभावी ढंग से लागू करने के तंत्र का अभाव है। हालांकि, कई पश्चिमी विश्लेषक इस बात को नहीं मानते कि चीन पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है। टेलर फ्रैवेल का तर्क है कि चीन आम तौर पर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का समर्थन तब करता है जब वे उसके हितों के अनुकूल हों, लेकिन वह उन कानूनी प्रक्रियाओं का विरोध करता है जिनसे उसकी संप्रभुता को खतरा महसूस होता है। दक्षिण-पूर्व एशिया के कई जानकारों का मानना है विवादित समुद्री इलाक़ों में चीन का कोस्ट गार्ड और मैरीटाइम मिलिशिया सक्रिय बने हुए हैं। कृत्रिम द्वीपों का विस्तार और उनका सैन्यीकरण जारी है। हाल के वर्षों में, सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला है कि चीन दक्षिण चीन सागर में द्वीपों का आकार बढ़ाकर या पूरी तरह से नए द्वीप बनाकर ज़मीन हासिल करने की कोशिशें बढ़ा रहा है। आसियान देश अक्सर क़ानूनी सिद्धांतों और चीन के साथ आर्थिक संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखते हैं। इस तरह, इस फ़ैसले का महत्व तो काफ़ी है, लेकिन इसे लागू करने की क्षमता सीमित है।
अमेरिका और यूरोप के कई एनालिस्ट का मानना है कि चीन का मना करना, नियमों पर आधारित बड़े इंटरनेशनल ऑर्डर को चुनौती देता है। उनका कहना है कि बाध्यकारी आर्बिट्रल अवॉर्ड को नज़रअंदाज़ करने से इंटरनेशनल संस्थाओं में भरोसा कमज़ोर होता है। लगातार पालन न करने से दूसरी जगहों पर भी ऐसा ही व्यवहार हो सकता है। यह नज़रिया अक्सर साउथ चाइना सी विवाद को नेविगेशन की आज़ादी और समुद्री सुरक्षा के बारे में बड़ी बहसों से जोड़ता है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के कुछ विद्वान, जो यथार्थवादी नज़रिया अपनाते हैं, उनका तर्क है कि चीन का व्यवहार बड़ी ताकतों की राजनीति के व्यापक पैटर्न को दिखाता है। इस नज़रिए के अनुसार, बड़ी ताकतें अक्सर ऐसे अंतरराष्ट्रीय कानूनी फैसलों का विरोध करती हैं जो उनके मुख्य राष्ट्रीय हितों के खिलाफ हों। अंतरराष्ट्रीय कानून देशों के व्यवहार पर असर तो डालता है, लेकिन रणनीतिक हिसाब-किताब पर शायद ही कभी हावी हो पाता है। पीसीए के फैसले का प्रतीकात्मक और कूटनीतिक महत्व है, भले ही उसे लागू करना सीमित ही क्यों न हो।
समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन की भूमिका
समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन मुख्य अंतरराष्ट्रीय संधि है जो दुनिया के महासागरों और समुद्रों के लिए कानूनी ढांचा तय करती है। इसे 'महासागरों का संविधान' भी कहा जाता है। यह समुद्री संसाधनों के इस्तेमाल, नेविगेशन (समुद्री यात्रा), पर्यावरण की सुरक्षा और विवादों को सुलझाने के मामलों में देशों के अधिकारों और जिम्मेदारियों को तय करता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रबंधित इस संधि को 165 से ज्यादा देशों और यूरोपीय संघ द्वारा इस कन्वेंशन को अपनाया गया है। कुछ देशों, खासकर अमेरिका ने इस पर दस्तखत तो किए हैं लेकिन इसे मंज़ूरी नहीं दी है, फिर भी अमेरिका आम तौर पर इसके कई प्रावधानों को पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय कानून के तौर पर मानता है। इस कन्वेंशन का मकसद समुद्रों के लिए एक व्यापक कानूनी व्यवस्था बनाना, तटीय देशों की संप्रभुता और नेविगेशन की आज़ादी के बीच संतुलन बनाये रखना, समुद्री शांतिपूर्ण इस्तेमाल को बढ़ावा देना, इसके संसाधनों के न्यायपूर्ण इस्तेमाल में मदद करना, पर्यावरण की सुरक्षा-संरक्षण करने के अलावा समुद्री विवादों को सुलझाने के लिए तरीके उपलब्ध कराना।
संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन आधुनिक समुद्री शासन का मुख्य आधार बना हुआ है। यह तटीय देशों के संप्रभु अधिकारों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के हितों के बीच संतुलन बनाता है। इन हितों में नेविगेशन की आज़ादी, समुद्री संसाधनों का टिकाऊ इस्तेमाल, पर्यावरण की सुरक्षा और विवादों का शांतिपूर्ण समाधान शामिल हैं। जैसे-जैसे समुद्री प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है और जलवायु परिवर्तन व गहरे समुद्र में माइनिंग जैसी नई चुनौतियाँ सामने आ रही हैं, संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन दुनिया के महासागरों के प्रबंधन के लिए मुख्य कानूनी ढाँचा प्रदान करना जारी रखे हुए है।
भारत ने 1995 में संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन को मंज़ूरी दी और इसके कई प्रावधानों को अपने घरेलू कानूनों में शामिल किया है। भारत के लिए यह संधि महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उसके अनन्य आर्थिक क्षेत्र यानी ईईजी और कॉन्टिनेंटल शेल्फ पर संप्रभु अधिकारों को सुरक्षित करता है। उसके अपतटीय ऊर्जा और मत्स्य पालन के विकास में मदद करता है। इस कानून के तहत हिंद महासागर में उसके नौवहन की स्वतंत्रता की रक्षा होती है। यही नहीं इसके सहयोग से पड़ोसी देशों के साथ समुद्री सीमा समझौतों के लिए उसे कानून का आधार मिलता है। इंटरनेशनल सीबेड अथॉरिटी (आईएसए) में भारत की भूमिका और गहरे समुद्र में खनिज अन्वेषण में भागीदारी का समर्थन करता है। आईएसए एक बहुत अहम भूमिका निभाता है क्योंकि गहरे समुद्र में पॉलीमेटैलिक नोड्यूल्स, कोबाल्ट-युक्त क्रस्ट और पॉलीमेटैलिक सल्फाइड्स जैसे कीमती खनिज पाए जाते हैं, जिनका इस्तेमाल बैटरी और दूसरी टेक्नोलॉजी में किया जा सकता है। साथ ही, गहरे समुद्र के इकोसिस्टम के बारे में अभी भी बहुत कम जानकारी है, इसलिए माइनिंग से पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बनी हुई है। नतीजतन, आईएसए एक मुख्य मंच बन गया है जहाँ सरकारें इस बात पर बातचीत करती हैं कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत कमर्शियल डीप-सी माइनिंग कैसे की जाएकृया की भी जाए या नहीं।
समुद्र पर शासन का एक मुख्य कारण और
1960 के दशक में समुद्र की तलहटी में मौजूद खनिजों पर गंभीरता से ध्यान दिया गया, जब अमेरिकी भूविज्ञानी जॉन एल. मेरो ने 'द मिनरल रिसोर्सेज ऑफ़ द सी' नाम की एक किताब प्रकाशित की। जूल्स वर्न की किताब '20,000 लीग्स अंडर द सी' में भी कैप्टन नीमो ने कहा था कि समुद्र की गहराइयों में जिंक, लोहा, चांदी और सोने की खदानें हैं, जिनका इस्तेमाल करना काफी आसान होगा। इन किताबों ने तर्क दिया कि समुद्र की तलहटी दुनिया की खनिज ज़रूरतों को पूरा करने के लिए आपूर्ति का एक बड़ा स्रोत बन सकती है। इसके बाद माल्टा के राजदूत अरविड पार्दाे ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली समिति के अपने एक भाषण में मांग की थी कि समुद्र की तलहटी के संसाधनों को 'मानवता की साझा विरासत' घोषित किया जाए। साथ ही, उन्होंने एक अंतरराष्ट्रीय नियम-कानून प्रणाली बनाने का आग्रह किया ताकि तकनीकी रूप से उन्नत देशों को समुद्र की तलहटी पर कब्ज़ा करने और विकासशील देशों के नुकसान की कीमत पर इन संसाधनों पर एकाधिकार करने से रोका जा सके।
कमर्शियल नज़रिए से तीन तरह के समुद्री मिनरल डिपॉजिट पर ध्यान दिया जा रहा है। पॉलीमेटैलिक नोड्यूल्स पूरे समुद्र में पाए जाते हैं और समुद्र की तलहटी में गहरे मैदानी इलाकों (एबिसल प्लेन्स) में बिखरे होते हैं; अक्सर ये बारीक तलछट में आंशिक रूप से दबे होते हैं। इन नोड्यूल्स में कई तरह की धातुएं होती हैं, जैसे मैंगनीज, लोहा, तांबा, निकेल, कोबाल्ट, सीसा और जस्ता; साथ ही इनमें मोलिब्डेनम, लिथियम, टाइटेनियम और नियोबियम जैसी धातुएं भी कम लेकिन महत्वपूर्ण मात्रा में पाई जाती हैं। कमर्शियल नज़रिए से सबसे ज़्यादा अध्ययन किया गया इलाका पूर्वी प्रशांत महासागर में क्लेरियन-क्लिपरटन ज़ोन (CCZ) है, जो 3,500 से 5,500 मीटर की गहराई पर स्थित है। अकेले इस डिपॉजिट में ज़मीन पर मौजूद सभी संसाधनों की तुलना में कहीं ज़्यादा निकेल, मैंगनीज और कोबाल्ट है। अन्य संभावित इलाकों में मध्य हिंद महासागर बेसिन और कुक आइलैंड्स, किरिबाती और फ्रेंच पोलिनेशिया के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन शामिल हैं।
निष्कर्ष
संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन आधुनिक समुद्री शासन का अभी भी मुख्य आधार बना हुआ है। लेकिन जैसे-जैसे समुद्री प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है और जलवायु परिवर्तन व गहरे समुद्र में माइनिंग जैसी नई चुनौतियाँ सामने आएंगी, संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन को दुनिया के महासागरों के प्रबंधन के लिए मुख्य कानूनी ढाँचा प्रदान करने में कैसी दिक्कतें आएगी, ये वक्त ही बताएगा। अभी देखा जाए तो, कुछ कानूनी जानकार आम तौर पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के तहत पीसीए के फ़ैसले को कानूनी रूप से बाध्यकारी मानते हैं।हालांकि, इस विवाद को अंतरराष्ट्रीय कानूनी नियमों और भू-राजनीतिक शक्ति के बीच तनाव के उदाहरण के तौर पर ही देखा जाता रहा हैं, खासकर तब जब बड़ी ताकतों को लगता है कि उनके अहम हित दांव पर लगे हैं।
Image Credit: China Daily
Author
Rekha Pankaj
Mrs. Rekha Pankaj is a senior Hindi Journalist with over 38 years of experience. Over the course of her career, she has been the Editor-in-Chief of Newstimes and been an Editor at newspapers like Vishwa Varta, Business Link, Shree Times, Lokmat and Infinite News. Early in her career, she worked at Swatantra Bharat of the Pioneer Group and The Times of India's Sandhya Samachar. During 1992-1996, she covered seven sessions of the Lok Sabha as a Principle Correspondent. She maintains a blog, Kaalkhand, on which she publishes her independent takes on domestic and foreign politics from an Indian lens.